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Chandra Shekhar Azad Biography In Hindi चन्द्रशेखर आज़ाद

Chandra Shekhar Azad Biography In Hindi

चन्द्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय

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अब भी जिसका खून ना खौला
वो खून नहीं वह पानी है
जो देश के काम ना आए
वह बेकार जवानी है

यह पंक्तियां भारत के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने कही थी|

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चंद्रशेखर आजाद का असली व पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था जिनका जन्म 23 जुलाई 1960 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में हुआ था बचपन से ही कसरत में रुचि होने के कारण उनका शरीर बहुत मजबूत था | उससे भी ज्यादा मजबूत था उनको भारत को आजाद कराने का जुनून जिसके लिए उन्हें अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी उनका नाम चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर आजाद कैसे पड़ा इसके पीछे भी एक रोचक घटना है कहते हैं कि पूत के लक्षण पालने में ही जाहिर होने लगते हैं| चंद्रशेखर आजाद के लिए यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती है|

जब पुलिस ने उनसे उनका नाम पूछा

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जब गांधी जी ने 1920 में नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट यानी असहयोग आंदोलन छेड़ा था उस समय लगभग 15 साल की उम्र में ही चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों की खिलाफत करने के लिए क्रांतिकारियों के साथ सड़क पर उतर आए थे उसी समय एक सभा के वक्त उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था जब पुलिस ने उनसे उनका नाम उनके पिता का नाम और उनका पता पूछा तो बोले मेरा नाम आजाद है मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा घर जेल है इसके लिए उन्हें 15 कोणों की सजा सुनाई गई थी|

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन

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तभी से वह धीरे धीरे आजाद के नाम से प्रसिद्ध होने लगे असहयोग आंदोलन के खत्म होने पर कई क्रांतिकारियों की तरह उन्हें भी बहुत हताशा हुई थी वह भी आजादी के लिए लड़ना चाहते थे मगर गांधीजी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं कि उनका मानना था कि भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए आक्रामक आंदोलन की जरूरत है जो कांग्रेस नहीं करेगी इसलिए वो राम प्रसाद बिस्मिल से मिले और उनकी पार्टी HRA यानी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में सम्मिलित होने की इच्छा जताई विष्णु ने शुरू में इनकार किया तो उन्होंने अपना हाथ एक लाइन के ऊपर रख दिया और तब तक रखे रहे जब तक बिस्मिल ने उनकी बात नहीं मानी|

धन लूटने का प्लान: काकोरी कांड

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बिस्मिल उनके इस अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया उसके बाद वह बेचारी के एक्टिव सदस्य बन गए और पार्टी के लिए पैसा इकट्ठा करने में लग गए हैं 1925 में HRA ने पैसों के बंदोबस्त के लिए अंग्रेजों का हत्या हुआ धन लूटने का प्लान बनाया जिसे हम काकोरी कांड के नाम से भी जानते हैं शाहजहांपुर से लखनऊ जाने वाली ट्रेन को बीच में ही चेन खींचकर रोक दिया गया इसी ट्रैन को लूटने का प्लान था क्योंकि उन्हें खबर मिली थी कि इसके गार्ड केबिन में कई भाग हैं जिसमें अंग्रेजों का खजाना ले जाया जाता है क्रांतिकारियों ने सिर्फ इन्हीं को लूटा और पब्लिक को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा मगर इस दौरान ट्रेन में मौजूद पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी जवाब में किधर से भी फायरिंग शुरू हुई और एक यात्री की मौत हो गई|

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

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अंग्रेज सरकार ने इसके लिए चोरी और मर्डर का मुकदमा चलाया और बहुत कड़ी छानबीन शुरू कर दी इस कांड के बाद HRA के लगभग सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए मगर 1928 में चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर HRA को फिर से मजबूत किया चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह सोशलिस्ट यानी समाजवादी विचारधारा से बहुत प्रभावित थे इसलिए उन लोगों ने HRA का नाम बदलकर HSRA यानी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया|

साइमन कमीशन

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उसी समय लाहौर में साइमन कमीशन का शांतिप्रिय तरीके से विरोध कर रहे लाला लाजपत राय और उनके कई साथियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया इसमें लाला लाजपत राय इतनी बुरी तरह जख्मी हुए कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई आजाद और उसके साथियों ने इस लाठीचार्ज का आदेश देने वाले पुलिस सुपरिटेंडेंट जेम्स एस्कॉर्ट को इसका जिम्मेदार माना और उसे मार कर इसका बदला लेने की कसम खाई है लेकिन हमले में असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट जॉन शर्मा के सारे ने इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली अंग्रेज सरकार ने आजाद के ऊपर 30000 रुपए का इनाम रख दिया|

अल्फ्रेड पार्क

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समय 30 हजार आज की करोड़ों रुपए के बराबर थी इतने बड़े इनाम के कारण पुलिस को उनके बारे में सूचना मिल गई 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में वह एक मीटिंग कर रहे थे जिसकी खबर मिलते ही पुलिस वहां पहुंच गई और आजाद को सरेंडर करने के लिए कहा आजाद ने उनसे लड़ाई शुरू कर दी और दोनों तरफ से गोलियां चलने लगी आजाद ने अपने सारे साथियों को वहां से भगा दिया और खुद लड़ाई करते रहे लेकिन जब गोलियां खत्म होने लगी तो उन्होंने खुद को गोली मार ली मगर अंग्रेजों के हाथ नहीं आए|

दोस्तों उन्होंने एक बार कहा था-

“दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे आजाद ही रहे हैं और आजाद ही रहेंगे

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अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने वही किया और सिर्फ 25 साल की उम्र में स्वतंत्र भारत का सपना अपनी आंखों में लिए आजाद की दुनिया से विदा हो गए आपको यह पोस्ट कैसी लगी कमेंट करके हमें बताएं और अपने दोस्तों के साथ जरूर साझा करे |
धन्यवाद | ( OSP )

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